क्या भारतीय फिल्में भारतीय युवाओं के दिमाग को भ्रष्ट करती हैं?

?प्रश्न का उत्तर जानने से पहले हमको ये समझना कि फिल्मो का क्या काम है हमारे समाज में फिल्मे समाज का आइना होती है
समाज में क्या हो रहा है वो आप फिल्मों से आसानी से समझ सकते है लेकिन आज कल फिल्मों का मकसद केवल ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाना रह गया है और फ़िल्म के नाम पर कुछ भी अनर्गल दिखाया भी जाता है।हमारी सरकारे अगर पद्मवत बैन कर सकती है तो ऐसी फिल्मे भी बैन होनी चाहिए जो युवाओ को ग़लत चीजो कि तरफ़ आकर्षित करती है।
अब ये तो रही फिल्मों कि बातें अब युवाओ के लिए ये कैसे हानिकारक है उसका विश्लेषण हम करते है एक फ़िल्म आयी ग्रैंड मस्ती कहने को ये एक अश्लील फ़िल्म की श्रेणी में आती है लेकिन सरकार ने किशोर युवाओ को ही इस फ़िल्म को दिखाने का फैन्सला किया युवाओ ने इस फ़िल्म को खुब सराहा भी इसमे कुछ अच्छे तो नही पर बुरे परिणाम जरूर निकले इससे लोगो ने यौन शिक्षा को तो बढावा नही दिया लेकिन लोगो को गाली देने में बढा आनन्द आने लगा ये है कि बुरी आदतो से लोग आसानी से प्रेरित हो जाते लेकिन अच्छी आदतें लेने में बढी दिक्कत होती है।
जैसे लोगो को शाहरुख और शाहिद
जैसा सुन्दर तो बनना लेकिन ये नही जानना चाहते वो इसके लिए क्या करते है बस एक उनका विज्ञापन देख कर फेयर एंड हेन्डसम
लगा लेते है।उन्हें ये नही पता होता कि शाहरुख कोई ये क्रीम नही लगाता केवल विज्ञापन करता है  सैफ कोई रोज अमुल माचो नही पहनता ना ही कभी सलमान रोज तुफानी करके हवा में उडता है। और न ही प्रियन्का रोज सुबह ये प्रश्न करने आती है कि आपके टूथ पेस्ट में नमक है?हम लोग अपने हीरो का चहेता होते होते
वास्तविकता से काफी दूर आ गए है ऐसा नही है कि अच्छी फिल्मे नही बनती बिल्कुल
 काफी फिल्मे है जो बहुत अच्छी है।
जो लोगो को मुश्किलों से लडना सिखाती हैं।
लेकिन बात ये है कि कितने लोग ने उन अच्छी फिल्मों से सीख ली है बहुत कम लोग लेकिन बुरी आदतें जरूर सीख ली होंगी जैसे उदाहरण के तौर पर जैसे हीरो फिल्म में हीरो धूम्रपान करता है तो काफी युवा उससे प्रेरित होते है लेकिन अगर वही हीरो अगर योग करता है। वह दान देता है। तो वो आदते लोग नही सीखते क्यों भाई हीरो ने मना किया उसकी अच्छी आदतें मत सीखो।
लडकीयों को छेढना वो सीखा देता है। लेकिन आपको किसी महिला का सम्मान करना नही सीखा पता क्यों कि ऐसी बातें फ़िल्म में रोचक तरीके से नही दिखायी जाती जिससे युवा दिमाग सिर्फ़ बुरी बातें सीखता है। क्योंकि बुरी आदतें सीखने में दिमाग कोई मेहनत नही करता लेकिन अच्छी आदते लेने के लिए मेहनत लगती है।और मेहनत करने में कष्ट करना पड़ता है।
और वैसे भी भारत में तो चमत्कार को नमस्कार होता है यहा मेहनत की बात करना व्यर्थ है। एक भारत के लोग एक गुलामी मानसिकता में जी रहे है। कि कोई फ़िल्म आयी नही बस चल देते है।कभी उस पर विश्लेषण नही करते क्यों करे क्यों कि विश्लेषण में तो मेहनत लगती है। साहब दिमाग को कोई परेशानी न हो जाए।
और बाते इनसे पश्चिमी देशों कि करवालो
लेकिन इनको ये नही पता वहाँ के लोग कितनी मेहनत करते है हर पहलु को परखते है और जरूरत पड़े तो विरोध भी करते है या सिरे से खारिज करते है।
बस इसीलिये ब्रिटिश हमको अपना गुलाम बना गए। क्योंकि हमने उनको व्यपार करने दिया। लेकिन उनको परखा नही सिकन्दर के समय भी यही था लेकिन भला हो जो आचार्य चाणक्य इसी देश में थे।आज वैसा ही एक सिकन्दर विदेशी कम्पनी के रुप में हमारे देश में है जो झूठे विज्ञापन दिखा दिखा कर हमको लुट रहा है।सलमान अगर एक ढक्कन खोलता हम समझते है वाह क्या अच्छा काम किया है। ये अन्धभक्ति है,दोगलापन है किसी भी अच्छी फ़िल्म को पैसा कमाने में बढी मुश्किल होती है। अगर सलमान किसी फ़िल्म में आ गया चाहे फिल्म में कुछ देखने लायक नही है।लेकिन सलमान को देखने सब जायेंगे वही अगर उससे अच्छा content  किसी प्ले में होगा तो उस जगह कोई परिन्दा भी पैर नही मारेगा। तभी तो अच्छे कलाकार बस फ़िल्म जगत में केवल संघर्ष करते रह जाते है उनको कोई अपना आदर्श नही मानता केवल इसलिए
अगर शाहरुख खान या यामी गौतम ने कह दिया कि आपको ये क्रीम लगानी चाहिये आप काले से गोरे हो जाओगे लेकिन कोई ये सच नही बताता जैसा हमको प्रकृति ने बनाया है हमे खुश रहना चाहिये फिल्मों में ये भी खुब बन ठन के दिखते है लेकिन ये सामान्य जीवन बिल्कुल साधारण व्यक्ति कि तरह रहते  है क्यू हम इनके प्रशन्सक तो है पर इनकी अच्छी बातो पर कभी ध्यान नही देते
एक बात में आपसे मजाक में कहना चाहता  हूँ जिससे आपको ये महसुस हो जायेगा कि हम कई बुरी आदतो के आदि है। उदाहरण के तौर पर आपमें से जिस व्यक्ति कि महिलामित्र होगी और जिन महिलाओ के पुरुषमित्र  है जब भी आपका आपस में झगडा हुआ हो या आपका सम्बन्ध टुटा हो।तो कुछ दिनो तक आपके दिमाग में केवल फिल्मी गाने ही बजते है आप फिल्मों की तरह ही सोचते हो। आप जैसा देखते हो बिलकुल वैसा ही सोचते हो और वैसे ही बन जाते हो जैसे फ़िल्म में हीरो रोता है आप भी रोते हो भाई क्यू क्या कभी ख़ुद से कभी पूछा है। में ऐसा क्यु कर रहा हुँ। क्युँ हमारे अन्दर कोई अपनी भावना नही आती उस समय फिल्मे ही क्यो याद आती है।
क्युंकि हमारे दिमाग को इसकी बुरी आदत हो गयी है। और इसलिए हम ऐसी स्थिति में ख़ुद को और ज्यादा परेशान करते है। ये अपने साथ एक ग़लत व्यव्हार है। क्योंकि इससे हम अच्छे बुरे का अन्तर करना भूल गए है। और हम फिल्मों से प्रेरित कम उनके गुलाम ज्यादा बन गए है फ़िल्म जगत से जुडा हुआ एक जगत है।दिखावा जगत हा साहब ये दिखावा संस्कृति यही से भारत में घुसी है।अगर अभिनेत्री ऊंची ऊंची सेन्डल पहने तो सारी लड़कियाँ उससे प्रेरित होंगी जबकि उनको पता है इससे शरीर का अस्थि सन्तुलन खराब होता है पर क्यो क्युकि लंबा होने का दिखावा  हावी है अगर हीरो रात को भी काला चश्मा लगाता है तो सारे लड़के चाहे रात को नही दिख रहा पर लगायेगें क्योंकि दिखावा जरूरी है साहब ऐसा नही जो मैने कहा वो बाते सब पर लागु होती है।जिन पर ये बाते लागु होती वो लोग आज भी आपको एक अलग ही व्यक्तित्व के साथ दिखेगें। लेकिन ज्यादातर युवा फिल्मो से प्रेरित है इसलिए ये दिखावे वाला रोग उन्हें लगा हुआ है। ये एक कडवी वास्तविकता है।
अगर देश को बदलना है तो ख़ुद की मर्जी के मालिक बनो। फिल्मो को सिनेमा घर तक ही रहने दो सोच बदलो तभी देश बदलेगा।
जय हिन्द जय भारत








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